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Gyani Pandit Ji - हम किसी कार्य का प्रारंभ करते हैं तो,

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🔴 साधारणत: हम किसी कार्य का प्रारंभ करते हैं तो कामना से करते हैं।  कुछ पाना है इसलिए करते हैं।  कोई महत्वाकांक्षा है, उसे पूरा करना है इसलिए करते हैं। ज्ञानी किसी कर्म का प्रारंभ किसी कारण से नहीं करता।  उसे कुछ भी पाना नहीं है, कुछ भी होना नहीं है।  जो होना था हो चुका। जो पाना था पा लिया। फिर भी कर्म तो होते हैं। तो इन कर्मों में कोई प्रारंभ की वासना नहीं है। कोई आरंभ नहीं है। प्रभु जो करवाता वह होता। शानी अपने तईं कुछ भी नहीं कर रहा है। प्रभु बुलाए तो बोलता। प्रभु मौन रखे तो मौन रहता। प्रभु चलाए तो चलता। प्रभु न चलाए तो रुक रहता। जिस दिन अहंकार गया उसी दिन कर्मों को प्रारंभ करने की जो आकांक्षा थी वह भी गई। अब कर्मों का प्रारंभ परमात्मा से होता और कर्मों का अंत भी उसी को समर्पित है। ज्ञानी में कर्म प्रकट होता है लेकिन शुरू नहीं होता; शुरू परमात्मा में होता है। लहर परमात्मा से उठती है, ज्ञानी से प्रकट होती है। इसे समझना। होता तो ऐसा ही अज्ञानी में भी है, लेकिन अज्ञानी सोचता है लहर भी मुझसे उठी। अज्ञानी अपने कर्मों का स्रोत स्वयं को मान लेता। वहीं बंधन पैदा होत...

Gyani Pandit Ji - संसार की यात्रा में तुम अकेले हो, (मृत्यु बोध)

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संसार की यात्रा में तुम अकेले हो, परमात्मा साथ नहीं है, याद रखना। और जिनको तुमने संग- साथ समझा है, नदी - नाव संयोग है। बस अजनबी इकठ्ठे हो गये हैं नाव मे। कोई पत्नी बन गई है, कोई पति बन गया है, कोई बेटा बन गया है, कोई भाई बन गया है, कोई मित्र बन गया है..... और नाव मे थोड़ी देर को हमने कैसे - कैसे खेल रचा लिए हैं - मोह के, आसक्ति के, राग के। यहां तुम बिल्कुल अकेले हो। मगर तुमने भ्रांति यह बना लिया है कि सब है भाई है पत्नी है, बेटा है, मित्र है। सब है, परिवार है प्रियजन है। जरा  सोंचो। एक बार फिर से पर्दा उठाकर देखो अपने भीतर, तुम बिल्कुल अकेले हो या नहीं ? पत्नी बाहर है, पति बाहर है, भीतर तो तुम बिल्कुल अकेले हो। यह संग - साथ झूठा है, यह छोड़ना पड़ेगा, तो असली संगी मिले। इसलिए मै कहता हूं, अकेले रह जाओगे, इसका मतलब यह मत समझना कि तुम अकेले हो गये,अकेले तुम रह जाओगे, तुम अचानक पाओगे, परमात्मा तुम्हारे साथ मौजूद है। असली संगी, असली साथी तुम्हारे साथ मौजूद है। और उसकी मौजूदगी ऐसी नहीं है कि वह पराया है। वह तुम्हारा अंतरतम है। वह तुम्हारे भीतर हीं जलता हुआ दीया है। सारा अस्तित्व त...

Gyani Pandit Ji - चार दिनों की प्रीत जगत में चार दिनों के नाते हैं।

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चार दिनों की प्रीत जगत में चार दिनों के नाते हैं। पलकों के पर्दे पडते ही सब नाते मिट जाते हैं। जिनकी चिन्ता में तू जलता वे ही चिता जलाते हैं। जिन पर रक्त बहाये जलसम जल में वही बहाते हैं। घर के स्वामी के जाने पर घर की शुद्धि कराते हैं। पिंड दान कर प्रेत आत्मा से अपना पिंड छुडाते हैं। चौथे से चालीसवें दिन तक हर एक रस्म निभाते हैं। म्रतक के लौटआने का कोई जोखिम नही उठाते हैं। आदमी के साथ उसका खत्म किस्सा हो गया। आग ठण्डी हो गई चर्चा भी ठण्डा हो गया। चलता फिरता था जो कल तक। बनके वो तस्वीर आज लग गया दीवार पर मजबूर कितना हो गया।